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main har qadam par sambhal sambhal kar bhatkne waala | मैं हर क़दम पर सँभल सँभल कर भटकने वाला
मैं हर क़दम पर सँभल सँभल कर भटकने वाला
भटकने वालों से काफ़ी बेहतर भटक रहा हूँ
Aahat Shayari
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दिल शाद किया और मोह लिया ये जौबन पाया होली ने
अभी से लग गया बिस्तर हमारा
इसी जन्नत में है अब घर हमारा
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चिड़ियों ने रात शोर मचाया दरख़्त पर
पहले तो देखी ग़ुर्बत फिर तख़्त-ओ-ताज देखा
दिल मगर ये कह रहा है सिर्फ़ तू और सिर्फ़ तू
मेरे चराग़ से सूरज ने रौशनी ली है
हमारे इश्क़ ने सस्ती शराब पी ली है
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As you were reading Shayari by Pallav Mishra
वो नूर मेरी हरारत से नार हो गया था
वो नूर मेरी हरारत से नार हो गया था
हवा चली ही नहीं ऐ महाज़-ए-राहगुज़र
वगर्ना ख़ाक का पुतला ग़ुबार हो गया था
जब उस की धूप ने देखी हमारी सूर्यमुखी
हमारा नाम गुलों में शुमार हो गया था
कहाँ ख़बर थी कि ये मरहला भी मुश्किल है
कि मैं तो पहली ही कोशिश में पार हो गया था
पता चला कि कोई दिल था दिल के अंदर भी
किसी का ग़म में मिरे इंतिशार हो गया था
ख़ुनुक से क़त्ल हुई इक सदा-ए-तीर-कुशी
बस इतनी बात थी मेरा शिकार हो गया था
हज़ार हैफ़ के मुबहम हुई मिरी दुनिया
हज़ार शुक्र कि तू आश्कार हो गया था
हज़ार हैफ़ कि पज़मुर्दा हो गईं आँखें
हज़ार शुक्र तिरा इंतिज़ार हो गया था
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क्या कीजिए कि होंट बहक जाएँ रेत पर
लहरों के साथ साथ हुमक जाएँ रेत पर
गो लाख सीपियों में समुंदर की क़ैद हों
मोती वही जो फिर भी झलक जाएँ रेत पर
कासा हर इक सदफ़ का लुटा जाए अशरफ़ी
ला’ल-ओ-जवाहरात खनक जाएँ रेत पर
टुक आँख तू भी खोल कि दरिया के लब खुलें
सातों दिशा के दाँत चमक जाएँ रेत पर
छिन जाएँ रस के फ़र्श से धरती के ग़ार में
और आसमाँ की छत से टपक जाएँ रेत पर
रखिए सफ़र में सब की तन-आसानियों की ख़ैर
ऐसा न हो कि घोड़े बिदक जाएँ रेत पर
सरगोशियों की मौज कहाँ ले के जाएगी
हम कुछ अगर जुनून में बक जाएँ रेत पर
सूरज की आसमाँ पे सितारों को ढाँप ले
ज़र्रों से आफ़्ताब दमक जाएँ रेत पर
दिल की धड़कती ख़ाक से साहिल बनाइए
पानी के पाँव आज थिरक जाएँ रेत पर
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सो अपने काँधे पे ले के ये घर भटक रहा हूँ
और उस के बाद के सब काम शश-जहात के हैं
वो रात ठहरी रही जब तलक दो-पहरी हुई
गुज़ार कर शब-ए-हिज्राँ सबों की सहरी हुई
वो कौन होगा जो वापस न लौट पाएगा
है इंतिज़ार में इक रहगुज़ार ठहरी हुई
हमारे चेहरे की ज़र्दी पे हाथ रख उस ने
इक ऐसा रंग लगाया कि छब सुनहरी हुई
उड़ाए ख़ाक तो तारों से भर गए अफ़्लाक
बिछाए तार गरेबाँ के तो मसहरी हुई
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